ठाकुरद्वारा-सुजानपुर

ठाकुरद्वारा-सुजानपुर मार्ग पर स्थित बाबा भीखाशाह की मजार लोगों की अटूट आस्था का केंद्र बनी रहती है। यहां प्रतिवर्ष ज्येष्ठ माह की संक्रांति से मेला आरंभ होता है, जो 9 दिनों तक चलता है। लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व लंबागांव के नाग वन में फकीर मस्त अली शाह तपस्या में लीन रहते थे। एक बार फकीर पंडित के घर गए। पंडित संतान न होने से दुखी था। फकीर ने पंडित को एक फल भेंट कर पत्नी को खिलाने को दिया और कहा कि उसके घर दो संतानें पैदा होंगी। फकीर ने कहा कि बड़ा लड़का मुझे दे देना। समय के साथ पंडित के यहां दो बेटों ने जन्म लिया, जिनके नाम भीखू तथा भोंदू रखे। पंडित फकीर को दिया वचन भूल गया और लगभग पांच वर्ष बाद फकीर ने पंडित के घर दस्तक दी और वचन याद दिलाया। पंडित को बड़ा बेटा फकीर को देना पड़ा और छोटा बेटा भी उनके साथ हो लिया। दोनों फकीर से शिक्षा ग्रहण करने लगे। एक बार दोनों गांव में भिक्षा मांगने गए। वहां एक वृद्धा रो रही थी। पूछने पर उसने बताया कि उसकी गाय मर गई थी। उन्होंने लोटे में पानी मंगवाया और गाय पर पानी के छींटे डाले और गाय जीवित हो गई।… इस घटना का पता जब फकीर को लगा तो फकीर ने कहा, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। एक दिन दोनों लकडि़यां लेने के लिए जंगल में गए, तो देखा कि कुछ लोग अर्थी लेकर जा रहे थे। एक बार फिर दोनों ने मृत आदमी को पानी के छींटे देकर जीवित कर दिया। गुस्से से फकीर अपना चिमटा गर्म कर दोनों की ओर भागे। चमत्कारी गुरु ने एक साथ दोनों का पीछा किया। भीखू ने भवारना पहुंचकर धरती मां से शरण की गुहार लगाई, जिससे धरती फट गई और भीखू उसमें समा गया। जबकि भोंदू नादौन में धरती में समा गया। इसके बाद फकीर को भी किसी ने नहीं देखा। भीखू ने जहां समाधि ली थी, उस स्थान पर कांगड़ा के राजा संसार चंद ने मजार बनवाकर उसको पक्का करवाया, जो आज भीखाशाह के नाम से विख्यात है।